ऐसा माना जाता है कि 2500 वर्ष से भी अधिक समय पहले गौतम बुद्ध ने संस्कृत के बजाय पाली भाषा में उपदेश देना चुना, क्योंकि संस्कृत अभिजात वर्ग की भाषा थी जबकि पाली आम जनता द्वारा बोली जाती थी। आज भारत में कोई भी पाली नहीं बोलता, लेकिन बौद्ध धर्मग्रंथ जो मूल रूप से पाली में लिखे गए थे, आज भी भिक्षुओं को शिक्षित करने के साथ-साथ बौद्ध मंत्रों में भी उपयोग किए जाते हैं। आज बीएचयू में इसपर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजन किया गया है। आठ देशों के विद्वान जुटे मुख्य उद्देश्य पालि साहित्य, बौद्ध दर्शन, त्रिपिटक अध्ययन, विभिन्न बौद्ध परंपराओं की तुलना, बौद्ध संस्कृति और विरासत, पांडुलिपि विज्ञान, और आज के समय में बौद्ध विचारों की प्रासंगिकता पर गहन चर्चा करना है। तीन दिनों में कुल 80 चयनित शोध-पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे। इस सम्मेलन में म्यांमार, कोरिया, श्रीलंका, नेपाल, कंबोडिया, जापान, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों के विद्वान, शोधकर्ता, प्रोफेसर और विषय विशेषज्ञ शामिल हुए हैं। अब जानिए इसमें शामिल नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो सिध्दार्थ ने क्या कहा… प्रोफेसर सिध्दार्थ ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा - बीएचयू में पाली भाषा और बौद्ध अध्ययन पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को वैश्विक मंच पर पुनर्स्थापित करने का सशक्त संदेश दिया। हाल ही में वर्ष 2024 में भारत सरकार ने पाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया है। ऐसे समय में बीएचयू जैसे ऐतिहासिक संस्थान में इस विषय पर वैश्विक सम्मेलन का आयोजन भारतीय सांस्कृतिक कूटनीति की दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। वैश्विक भागीदारी, एशियाई देशों का विशेष योगदान सम्मेलन में श्रीलंका, जापान सहित एशिया के कई देशों से बौद्ध भिक्षु और विद्वान शामिल हुए। जापान के विश्वविद्यालयों के साथ शैक्षणिक सहयोग (कोलैबोरेशन) भी इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहा। इस अंतरराष्ट्रीय सहभागिता ने यह स्पष्ट किया कि पाली भाषा केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि आज भी विश्व को जोड़ने का माध्यम है। प्रोफेसर सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि पाली भाषा और साहित्य भारत से ही विश्व के विभिन्न देशों में पहुंचा और आज भी भारतीय विदेश नीति तथा सांस्कृतिक कूटनीति में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने प्रधानमंत्री के उस कथन का उल्लेख किया जिसमें कहा गया है कि “भारत ने विश्व को युद्ध नहीं, बुद्ध दिया है।” भगवान बुद्ध के मूल उपदेश पाली भाषा में सुरक्षित हैं, जिन्हें ‘तिपिटक’ के नाम से जाना जाता है, और विश्वभर में उनका अत्यंत सम्मान है। तिपिटक का वैश्विक सम्मान पाली भाषा में संकलित बौद्ध ग्रंथ ‘तिपिटक’ के प्रति अंतरराष्ट्रीय सम्मान का उदाहरण देते हुए बताया गया कि थाईलैंड के प्रधानमंत्री द्वारा भारत के प्रधानमंत्री को पाली तिपिटक भेंट किया जाना सांस्कृतिक संबंधों की गहराई को दर्शाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पाली भाषा भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच आध्यात्मिक और सांस्कृतिक सेतु का कार्य कर रही है। एआई के युग में पाली भाषा: नई रणनीति पर विचार सम्मेलन के दौरान शिक्षा और तकनीक, विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई। प्रोफेसर सिद्धार्थ सिंह, जो वर्तमान में नव नालंदा महाविहार के कुलपति भी हैं, ने बताया कि एआई के माध्यम से पाली भाषा और साहित्य को वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रभावी ढंग से प्रसारित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि— एआई आधारित अनुवाद उपकरणों से पाली ग्रंथों को विभिन्न भाषाओं में सरलता से उपलब्ध कराया जा सकता है। डिजिटल ऐप और ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म के जरिए पाली अध्ययन को आम विद्यार्थियों तक पहुंचाया जा सकता है। प्राचीन पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण और टेक्स्ट विश्लेषण में एआई की बड़ी भूमिका हो सकती है।